शिव की ससुराल प्राचीन नगरी कनखल और शांतिकुंज आश्रम की यात्रा

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अब हमारा घर वापसी का समय आ गया था जिसके कारण हम ऋषिकेश से वंहा के स्थानीय परिवहन के साधन टेम्पो द्वारा हरिद्वार के लिए निकले। मेरी आदत है कि मै चलते समय गूगल मैप भी चेक करता रहता हूँ जिससे मैं जंहा से गुजर रहा हूँ वंहा के आसपास घूमने वाली जगहों के बारे में पता चल सके और अगर संभव हो तो घूमा जा सके। मैने देखा कि शांतिकुंज का आश्रम रास्ते में ही है। अतः हम इस आश्रम का भ्रमण करने के लिए रूक गए।

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शांतिकुंज आश्रम में स्थित गुरू मंदिर

शांतिकुंज हरिद्वार

इस आश्रम की बहुत ख्याति है। इस आश्रम की स्थापना पंडित श्री राम शर्मा आचार्य और उनकी पत्नी भगवती शर्मा ने की थी। यह आश्रम जिस स्थान पर स्थित है उसको महर्षि विश्वामित्र की तपस्थली माना जाता है। यह छात्रों के लिए प्रतिवर्ष भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का आयोजन करता है जिसे मैंने भी बचपन में दिया था।आश्रम में प्रवेश करने से पहले आपको अपने बारे में जानकारी देनी होती है जिससे आपको प्रवेश पर्ची मिलती है जो निकासी के समय वापस जमा हो जाती है। यह औषधियों और साहित्य का निर्माण भी करते है। मैने कुछ किताबें और औषधियां खरीदी जिनकी गुणवत्ता अच्छी थी। यंहा एक भोजनालय भी है जंहा हमने भोजन किया। यंहा का भोजन घर जैसा और कम मसाले का था। यंहा का भोजनालय काफी साफ सुथरा है। यंहा भोजन करने के पश्चात आपको अपने बर्तन स्वयं धोकर रखने पड़ते है।

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शांतिकुंज, हरिद्वार में स्थित गायत्री माता का मंदिर

इस आश्रम की एक खास बात यंहा स्थित गायत्री माता मंदिर है। यंहा एक अखंड दीपक स्थित है जो सन 1926 से लगातार प्रज्वलित है। इस आश्रम में मुख्य रूप से गायत्री माता की पूजा होती है। यंहा मंत्र जप और ध्यान साधना को काफी महत्व दिया जाता है। आश्रम काफी साफ सुथरा और सुव्यवस्थित है। पूरा आश्रम घूमने में आपको कम से कम दो घंटे का समय लग जायेगा। इस आश्रम के तीन प्रवेश द्वार है।

यंहा से निकलने के पश्चात हम सीधे रेलवे स्टेशन पहुंचे। यंहा आकर पता चला कि हमारी ट्रेन 3 घण्टे से ज्यादा लेट है। अब हम स्टेशन पर बैठे सोचने लगे कि क्या किया जाये कि यह समय कटे। फिर गूगल मैप का सहारा लिया तो पता चला कि यंहा से थोड़ी दूरी पर ही कनखल नामक जगह है जोकि घूमने योग्य है फिर हम यहीं के लिए निकल पड़े।

कनखल

कनखल की दूरी हरिद्वार स्टेशन से 3.5 किमी है। कनखल को भगवान शिव की ससुराल भी कहते है। कनखल वहीं जगह है जंहा दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। इस यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया। दक्ष द्वारा भगवान शिव के अपमान से आहत होकर माता सती ने इसी यज्ञ की यज्ञवेदी में अपने शरीर का त्याग किया था। यह खबर जब शिव जी को मिली तो उन्होंने अपने प्रमुख गण वीरभद्र को दक्ष का वध करने का आदेश दिया। यहीं पर वीरभद्र ने दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया। आगे की कथा काफी लंबी है जिसका वर्णन करने का यंहा कोई मतलब नहीं है।
कनखल भी एक प्राचीन नगर है। कभी यह हरिद्वार जितना ही प्रमुख नगर था परंतु विकास की दौड़ में हरिद्वार आगे निकल गया और यह उपेक्षित रह गया। यंहा भी कई प्रमुख मंदिर और आश्रम है

दक्षेश्वर महादेव मंदिर

इस मंदिर में जैसे ही हमने प्रवेश किया तो सामने एक प्रतिमा थी जिसमें क्रोध में शिव जी सती का शव गोद में लिए हुए थे। इस मूर्ति को देखकर ही यंहा के पौराणिक महत्व का पता चल जाता है। इस मंदिर में प्रवेश करने पर हमें एक यज्ञवेदी के दर्शन हुए। कहते है कि इसी यज्ञवेदी में माता सती ने अपने शरीर का त्याग किया था। मंदिर में अन्य मूर्तियां भी स्थापित है जिनमें प्रमुख है दक्ष महादेव का शिवलिंग। बताते है कि यह स्वयम्भू शिवलिंग है। स्वयम्भू शिवलिंग उसे कहते है जो स्वयं प्रकट होता है। इस मंदिर में साधारण भीड थी जिससे दर्शन सहजता से हो गए। यंहा का वातावरण काफी शांत है। यह मंदिर गंगा नदी के तट पर ही स्थित है।

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कनखल में स्थित सती के शरीर को उठाये हुए शिव की प्रतिमा

दशमहाविद्या मंदिर
यह मंदिर दक्षमहादेव मंदिर के सामने ही स्थित है। इस मंदिर में जब हमने प्रवेश किया तो हमें यंहा देवी के दशमहाविद्या रूप के दर्शन हुए। देवी के दशमहाविद्या के नाम इस प्रकार है
काली
तारा
त्रिपुर सुंदरी
भुवनेश्वरी
भैरवी
छिन्नमस्तिका
धूमावती
बगलामुखी
मातंगी
कमला
इन सभी का अपना अपना बड़ा ही महत्व है और यह अपने साधक को अपने अनुसार फल प्रदान करती है। यंहा हमने दर्शन कर पंडित जी से प्रसाद लिया और अन्य मंदिरों और आश्रमों के दर्शन के लिए आगे बढ़ गए।

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कनखल स्थित मंदिर

हरिहर आश्रम
यह आश्रम अवधेशानंद जी महाराज की देखरेख में है। यह मंदिर पूरे भारत में प्रसिद्ध है जिसके कई कारण है। पहला कारण यंहा पारद का शिवलिंग पारदेश्वर विराजमान है जोकि विश्व का प्रथम पारद शिवलिंग है ऐसा माना जाता है। पारद शिवलिंग पारे को बांध कर बनाया जाता है। यंहा बांधने से मतलब है कि पारद धातु साधारण तापमान पर तरल अवस्था में रहती है लेकिन किसी तरह जब हम इसे किसी तरह सामान्य तापमान पर ठोस अवस्था में प्राप्त कर लेते है तो इसे पारद कहते है। पारद शिवलिंग की पुराणों में बड़ी महत्ता बताई गई है। कहा जाता है कि इसके दर्शन और पूजन का फल करोङो शिवलिंग के दर्शन के बराबर होता है। इसके दर्शन और पूजन से व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक दोषों से मुक्ति मिलती है।
इसके अलावा यंहा रुद्राक्ष का एक पेड़ भी विद्यमान है जोकि रुद्राक्ष के फल प्रदान करता है। रुद्राक्ष का भी बड़ा महत्व है इसका महत्व शिव जी से संबंधित है इसकी पूरी एक कथा है शिवपुराण और अन्य ग्रंथों में जिसका उल्लेख यंहा करने से यह पोस्ट और लंबी हो जाएगी। आमतौर पर इसके वृक्ष जल्दी देखने को नहीं मिलते है। मैंने इसके पहले सिर्फ नेपाल में ही रुद्राक्ष का पेड़ देखा था।
इस आश्रम में कई राजनीतिक और अन्य क्षेत्रों से संबंधित मशहूर हस्तियां आ चुकी है जिनकी फ़ोटो इस आश्रम में मौजूद है।

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रुद्राक्ष के बारे में जानकारी

आनंदमयी मां आश्रम

हरिहर आश्रम से आगे बढ़ने पर हम आनंदमयी मां के आश्रम पहुंचे। आनंदमयी मां एक प्रसिद्ध और महान संत मानी जाती है। इनका जन्म मूलरूप से तब के भारत और वर्तमान के बांग्लादेश में हुआ था। देश भर में कई स्थानों पर इनके आश्रम स्थित है। इस आश्रम की महत्ता इसलिए ज्यादा है कि माता ने अपना अंतिम समय यहीं गुजारा और यंही अपने प्राणों का त्याग किया।

कनखल की हमारी यात्रा इस प्रकार सम्पूर्ण हुई और हम वापस अपने समय से हरिद्वार स्टेशन पंहुच गए जंहा से हमारी घर वापसी की यात्रा आरंभ हुई और इस यात्रा का समापन।
इस प्रकार हमारी हरिद्वार, ऋषिकेश और कनखल की यात्रा समाप्त हुई जिसकी याद से हमें काफी समय तक ऊर्जावान बने रहेंगे।

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गायत्री माता शांतिकुंज, हरिद्वार में

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